मन की जीत या मन को जीतो कितने समान से लगते हैं। केवल की को का अन्तर है, पर वास्तव में इनके अर्थ में बहुत अन्तर है। हम मन की जीत के अनुसार ही तो कार्य करते हैं। विचार ही संकल्प का रूप धारण करते है और कार्य के क्रम में परिवर्तित होते हैं। हमारे मन के अनुसार ही हम कार्य करते हैं अर्थात हमारी पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ जो पसन्द करती है, हम नहीं करते हैं। और हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ ही बाह्य वस्तु से अवगत कराती है। कभी-कभी इसमें व्यवधान उत्पन्न होता हे, जब हमें मन के विरुद्ध काम करना पड़ता है, जैसे सर्विस में ड्यूटी निभाते वक्त या कभी-कभी परिस्थितिवश। यदि ड्यूटी-वश कार्य करना पड़े तो ठीक है, अन्यथा कभी-कभी मन के विरुद्ध कार्य गलत कामों की ओर ले जाता है। मन में सुनीति और कुनीति दोनों बसती है। जब हम सुनीति की सुनते हैं, तो अच्छे काम, सही काम करते हैं, पर जब कुनीति की सुनते हैं, तो गलत काम करते हैं, इसी कारण व्यक्ति निन्दनीय और अपराधिक काम करने लगता है और बुरा व्यक्ति बन जाता है।
Thoughts become resolutions and are transformed into actions. We act according to our mind, meaning we don't do what our five senses desire. Our senses are what inform us about external objects.
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