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विशेष सूचना - Arya Samaj, Arya Samaj Mandir तथा Arya Samaj Marriage और इससे मिलते-जुलते नामों से Internet पर अनेक फर्जी वेबसाईट एवं गुमराह करने वाले आकर्षक विज्ञापन प्रसारित हो रहे हैं। अत: जनहित में सूचना दी जाती है कि इनसे आर्यसमाज विधि से विवाह संस्कार व्यवस्था अथवा अन्य किसी भी प्रकार का व्यवहार करते समय यह पूरी तरह सुनिश्चित कर लें कि इनके द्वारा किया जा रहा कार्य पूरी तरह वैधानिक है अथवा नहीं। "आर्यसमाज मन्दिर बैंक कालोनी अन्नपूर्णा इन्दौर" अखिल भारत आर्यसमाज ट्रस्ट द्वारा संचालित इन्दौर में एकमात्र मन्दिर है। भारतीय पब्लिक ट्रस्ट एक्ट (Indian Public Trust Act) के अन्तर्गत पंजीकृत अखिल भारत आर्यसमाज ट्रस्ट एक शैक्षणिक-सामाजिक-धार्मिक-पारमार्थिक ट्रस्ट है। आर्यसमाज मन्दिर बैंक कालोनी के अतिरिक्त इन्दौर में अखिल भारत आर्यसमाज ट्रस्ट की अन्य कोई शाखा या आर्यसमाज मन्दिर नहीं है। Arya Samaj Mandir Bank Colony Annapurna Indore is run under aegis of Akhil Bharat Arya Samaj Trust. Akhil Bharat Arya Samaj Trust is an Eduactional, Social, Religious and Charitable Trust Registered under Indian Public Trust Act. Arya Samaj Mandir Annapurna Indore is the only Mandir controlled by Akhil Bharat Arya Samaj Trust in Indore. We do not have any other branch or Centre in Indore. Kindly ensure that you are solemnising your marriage with a registered organisation and do not get mislead by large Buildings or Hall.

श्रीराम के सच्चे अनुयायी - केवल आर्य समाजी

आर्य समाज के बारे में बहुत सी भ्रान्तियॉं पौराणिक पुरोहितों, पुजारियों एवं विद्वानों ने अपने स्वार्थ हित साधारण हिन्दू जनता में फैला रखी हैं। एक गलतफहमी यह भी प्रचलित है कि आर्यसमाजी तो श्रीराम और कृष्ण को मानते ही नहीं। वास्तविक स्थिति यह है कि भले ही वेदों की शिक्षानुसार हम इन महापुरुषों, युगपुरुषों को ईश्वर या ईश्वर का अवतार नहीं मानते, तथापि हम उनका अत्यन्त आदर करते हैं, उनको आर्यों का प्रतीक मानते हैं, उनके आदर्शों पर तथा उनके मार्ग पर चलने का प्रयास करते हैं, जबकि सनातनी (पौराणिक) बन्धु स्वयं उन युग पुरुषों के सन्देश का सम्भवत: सही अर्थ नहीं समझते। इन महापुरुषों को कई चमत्कारों, भ्रमजालों, विसंगतियों और सृष्टिक्रम विरुद्ध मान्यताओं से ओतप्रोत कर रखा है। यदि आज श्रीराम और श्रीकृष्ण स्वयं भी आ कर देखें, तो वे इन मनगढन्त, अव्यावहारिक एवं कपोलकल्पित कथाओं का अनुमोदन नहीं करेंगे, क्योंकि वे महान्‌ वैदिक धर्मी थे और ऐसी तिलिस्मी करामातों में विश्वास नहीं रखते थे।

श्रीराम के समय न गीता थी, न महाभारत लिखी गई थी, न अभी रामायण ही पूरी हूई और न एक भी पुराण था। पुराण ईसा की आठवीं से दसवीं शताब्दी के बीच लिखे गये, यह अन्वेषणों से सिद्ध किया जा चुका है। उनके लेखक ऋषि नहीं थे, उनका नाम श्रद्धालु जनता को भ्रमित करने के लिए लिखा जाता है । प्रश्न यह है कि श्रीराम कौन से धार्मिक ग्रन्थ पढते थे? वह वेद, उपवेद, दर्शन, उपनिषद्‌ ही पढते थे और आज इस वैदिक धरोहर का अध्ययन सनातनी भाई तो नहीं करते दिखाई देते एकाध को छोड़ कर। हॉं, आर्य समाजी अवश्य करते हैं। श्रीराम प्रतिदिन नियमपूर्वक सन्ध्या तथा हवन वेद मन्त्रों के उच्चारण से करते थे। आज उन्हीं वेद मन्त्रों से आर्य समाजी सन्ध्या और हवन अपने घरों/मन्दिरों में करते हैं, पौराणिक नहीं। वे तो आरती बोलते हैं और हवन में नौ ग्रहों की पूजा, गणेश पूजा आदि कराते हैं, जिनका वेदों में जिक्र तक नहीं है। जब आर्य समाजी उन्ही मन्त्रों और उन्हीं धार्मिक ग्रन्थों को आज भी पढते हैं, जिन्हें श्रीराम पढते थे, तो वे राम के सच्चे पथगामी हुए या नहीं? राम तो यज्ञ की रक्षा करने ऋषि विश्वामित्र के साथ वन में गये और मुनियों को अभय किया। सन्त शिरोमणि तुलसीदास  रामचरितमानस में लिखते हैं:

प्रात कहा मुनि सन रघुराई,

निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई।

होम करन लागे मुनि झारी,

आपु रहे मख की रखवारी।।

आज वही वैदिक यज्ञ आर्यसमाजी करते हैं, अत: वही राम के सच्चे अनुयायी हैं। 

आर्य मन्दिरों में विवाह वैदिक विधि से होता है, परन्तु अपने आपको राम भक्त कहने वाले सनातनी आज ऐसा विवाह कराना पसन्द नहीं करते, जबकि आर्य समाजी करते हैं। बताइये! श्रीराम के पद चिन्हों पर चलने वाले आर्य समाजी हुए या सनातनी? सीता जी के कन्यादान का वर्णन रामचरित मानस में इन शब्दों में किया गया है-

सुख मूल दूलहु देखि दम्पति पुलक तन हुलस्यो हियो।

करि लोक वेद विधानु कन्यादानु नृपभूषण कियो।

और

क्यों करै बिनय बिदेहु कियो बिदेहु मूरति सावंरी।

करि होमु विधिवत्‌ गांठि जोरी होन लागी भावंरी।।

अर्थात्‌ रामजी का विवाह और फेरे हवन कुण्ड के चारों ओर हुए और सीता का कन्यादान वेद विधान से हुआ।

श्रीराम की फैलाई चेतनता से लाखों वर्ष बाद भी विश्व में चेतनता है। उनके आदर्शों के लिए आर्य ही नहीं, समस्त संसार सदैव के लिए ऋणी रहेगा, क्योंकि उनके आदर्श, उनकी मर्यादाएं मानव मात्र पर लागू होती हैऔर उनसे किसी भी मनुष्य का विरोध हो ही नहीं सकता। परन्तु पौराणिकों की लीला तो देखिये कि उस जन जन को चेतनता प्रदान करने वाले महामानव को उनकी जड़ मूर्ति बना कर अपने मन्दिरों के छोटे से किसी कमरे मेंे बन्द कर रखा है और आगे से लोहे की ग्रिल लगा रखी है, मानो श्रीराम कोई कैदी हों। कहते यह हैं कि राम की कृपा से सब को खाने-पहनने को मिलता है, परन्तु राम को प्रतिदिन दो समय खाना खिलाने का नाटक करते हैं। अच्छा है नाश्ता नहीं करवाते, दूध फल आगे रखते हैं, मगर मुंह में नहीं डालते। यह दूसरी बात है कि राम कभी खाते नहीं। रामजी को स्नान करवाते हैं, वस्त्र बदलते हैं, आराम करवाते हैं, गहने पहनाते हैं। जब सबको देने वाले राम ही हैं, तो फिर यह दिखावा क्यों?

राम की महानता का कोई पारावार नहीं। उनके आदर्श, मान्यताएं, मर्यादाएं, विकट से विकट परिस्थितियों में भी सम रहने की क्षमता, उदारता, सहनशीलता एक अलग ही कोटि की हैं। उन जैसा माता-पिता का आज्ञाकारी, उन जैसा स्नेही भाई, उन जैसा प्रजापालक और धर्म रक्षक राजा, उन जैसा तपस्वी, त्यागी, धर्मात्मा आज तक कभी नहीं हुआ है। काश, कि पौराणिक हिन्दू जगत्‌ उनकी इस महानता को समझता।

बेशक आर्य समाज मन्दिरों में राम की प्रतिमा का पूजन न होता हो, उनको भोग न लगाया जाता हो, किन्तु उनके प्रिय वेदों और आर्ष ग्रन्थों का पाठ अवश्य होता है । उनको प्रिय सन्ध्या और हवन रोज होते हैं तथा उनके आदर्शों पर चलने की शिक्षा अवश्य दी जाती है।  मर्यादा पुरुषोत्तम राम का जयघोष अवश्य होता है। रामनवमी, विजयादशमी तथा दीपावली के पावन पर्वों पर राम के आदर्शों का गुणगान भी होता है। इस प्रकार आर्य समाज राम की सच्ची पूजा करता है, जैसे माता-पिता और गुरुओं की जाती है।  -विशम्भरनाथ अरोड़ा (आर्यजगत्‌ दिल्ली, 9 अप्रेल 2000)

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