Established in: 1875 at Mumbai

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आर्यसमाज का मौलिक आधार

लेखक - स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती

सर्वश्रेष्ठ अध्येताओं के अनुसार हिमालय के आस-पास ही मनुष्य का अवतरण हुआ है। वहीं से उसकी संस्कृति का और मानव जाति की यात्रा का प्रारम्भ होता है। वेद के दिव्य वाक्य मानव जाति के जीवन के आधार बने। कुछ काल प्रेम और आनन्द से रहने के बाद यहीं से मनुष्य समस्त संसार में बिखर गये।

नयी परिस्थितियों ने मनुष्य जाति को नयी भाषा, नये रीति-रिवाज और नये मानदण्डों से सम्पन्न कर दिया। इसीलिए आज हम विविधता के संसार में निवास कर रहे हैं। वेद समस्त मानव जाति की अटूट और अमूल्य निधि है। सृष्टि के आरम्भ से महाभारत काल तक वैदिक ज्ञान के आलोक से समस्त संसार आलोकित था।

कालोपरान्त ज्ञान के इस अप्रतिहत प्रवाह में अनेक विषाक्त धाराओं का सम्मिश्रण हो गया और ज्ञान विज्ञान की पावन वैदिक धारा ऐसी बदली कि उसको पहचानना भी कठिन हो गया। वैदिक ज्ञान के पुनरुद्धार की आवश्यकता का अनुभव होने लगा। ऐसे संकटमय युग में महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती का प्रादुर्भाव हुआ, जिन्होंने वैदिक ज्ञान की ज्योतिर्मय परम्परा को पुनर्जीवित किया।

1875 ई. में महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने मुम्बई में आर्य समाज की स्थापना कर धार्मिक और सामाजिक क्रान्ति का शंख फूंक कर नवयुग का सूत्रपात किया। स्वामी दयानन्द ने वेद पठन पाठन का अधिकार सबको प्रदान किया। वेद की शिक्षाओं को समान रूप से सबके लिए उपादेय बताया। सन्निहित स्वार्थो के कारण भारत ही नहीं अनेक देशों में नए धार्मिक सम्प्रदाय बन गए। अनेकानेक मतमतान्तरों ने जन्म लिया। उनके अन्धविश्वासों पर स्वामी दयानन्द ने निर्ममतापूर्वक प्रहार किया। स्वामी जी ने धर्म के स्वाभाविक, सहज, सार्वभौम स्वरूप का परिचय कराया। मानव जाति की एकता एवं अखण्डता पर बल देते हुए उन्होंने मानवता के मंगलमय मार्ग को प्रशस्त कर दिया।

परमात्मा- वेद का धर्म एकेश्वरवादी है। वेदानुसार परमेश्वर एक है, अनेक नहीं। वह सनातन है और ज्ञान का शाश्वत स्रोत है। वही परमेश्वर हमारा आश्रय है और सृष्टि का कर्त्ता है। वह दयालु तथा न्यायकारी है। परमेश्वर सर्वज्ञ, सर्वव्यापक तथा सर्वशक्तिमान्‌ है। वह निराकार तथा अजन्मा है। वह सत्‌, चित्‌ एवं आनन्द है। ऐसा ही परमेश्वर मानने और पूजने योग्य है। परमेश्वर सम्बन्धी नाना अनर्गल धारणाओं से स्वामी दयानन्द ने हमें मुक्त किया। सत्य-ज्ञान से, सत्यनिष्ठ कार्य से, सेवाभाव से और योगाभ्यास से ही परमेश्वर की प्राप्ति सम्भव है, ऐसी उन्होंने उद्‌घोषणा की।

जीवात्मा- वैदिक धर्मानुसार जीवात्मा असंख्य हैं। प्रत्येक जीवात्मा अपने कर्मो के लिए उत्तरदायी है। पशु-पक्षी भोग योनियॉं हैं। मनुष्य ही एकमात्र उभययोनि है। पशु-पक्षी सहजवृत्ति से अपना जीवन यापन करते हैं। मनुष्य बुद्धि और विवेक से काम लेता है। जन्म-मरण का चक्र  अनादि काल से चला रहा है। धूप-छांह की तरह सुख-दु:ख जीवन के साथ है, किन्तु मनुष्य परमेश्वर की शक्ति, परोपकार, सदाचार आदि के द्वारा मुक्ति की अवस्था को प्राप्त कर सकता है। मुक्तावस्था शाश्वत्‌ नहीं है। क्योंकि सान्त कर्मों का अनन्त फल कदापि नहीं हो सकता।

परमात्मा और जीवात्माएं पृथक्‌ सत्ताएं हैं। परमात्मा एक है और जीवात्माएं अनेक हैं। परमात्मा ज्ञान और आनन्द का स्रोत है, परन्तु जीवात्माएं ज्ञान और आनन्द के लिए परमात्मा पर निर्भर हैं। परमात्मा सृष्टि का कर्त्ता और जीवात्मा भोक्ता है। परमात्मा अशरीरी और जीवात्मा शरीरी है। परमात्मा अजन्मा और जीवात्मा शरीर के माध्यम से जन्म-मरण के चक्र में आता जाता है। परमात्मा कर्माध्यक्ष है और जीवात्मा शुभाशुभ कर्मों का कर्त्ता और उनके फलों का भोक्ता है। परमात्मा सर्वदा मुक्त है, किन्तु जीवात्मा मुक्ति और बन्धन को प्राप्त होता रहता है।

प्रकृति- वैदिक सिद्धान्तानुसार परमात्मा तथा जीवात्मा के सदृश प्रकृति भी अनादि है। ये तीनों तत्व सदा से हैं और सदा रहेंगे। आद्य प्रकृति का कोई रूप रंग नहीं। आद्य प्रकृति के सम्बन्ध में कुछ भी कहना अत्यन्त कठिन है। परमात्मा की शक्ति प्रकृति को नाना रूपों और नाना रंगों में परिवर्तित कर सकती है। परमात्मा की शक्ति से प्रकृति सृष्टि की संरचना करती है। अभाव से भाव की उत्पत्ति सम्भव नहीं है। बिना प्रकृति के सृष्टि बन ही नहीं सकती।

परमात्मा सृजन द्वारा ही अपने आप को अभिव्यक्त करता है। सृष्टि अटल शाश्वत्‌ नियमों पर आश्रित है। वैदिक सिद्धान्तानुसार प्रकृति सत्‌ एवं उद्देश्य पूर्ण है। सृष्टि में नियम, व्यवस्था तथा उद्देश्य से परमात्मा की महिमा का दर्शन होता है। सृष्टि का सृजन, संहार निरन्तर चलता रहता है। इस सृष्टि से परमात्मा अहर्निश कर्म में लगा रहता है।

जीवन- परमात्मा सर्वोच्च नैतिक आदर्शों एवं मूल्यों का साकार रूप है। वैदिक परमात्मा एक अर्थ में नैतिक परमात्मा है। सत्य और दया का मूर्तिमान रूप है। नैतिक-आदर्श नाना रूपों में अभिव्यक्त होते हैं। "परमात्मा की रची सृष्टि का ज्ञान प्राप्त करो, उस ज्ञान से मानव-जाति को सम्पन्न करो" यह हमारे जीवन का उद्देश्य है। सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि नैतिक मूल्यों के अभाव में जीवन का वैभव निस्तेज और निष्प्राण हो जाता है। साधना, स्वाध्याय और सत्पुरुषों का संग, उपासना आदि द्वारा नैतिक आदर्श को जीवन में उतारना सम्भव है, अन्यथा नहीं।

वेदानुसार सर्वोच्च नैतिक सत्ता है परमात्मा। एतदर्थ परमात्मा की प्रार्थना वैदिक उपासना पद्धति का अविभाज्य अंग है। परमात्मा को स्तुति-प्रार्थना-उपासना की किञ्चित्‌ भी आवश्यकता नहीं है। स्तुति-प्रार्थना-उपासना से जीवात्मा परमशुद्धता को प्राप्त होकर सत्कर्मों को करने की सामर्थ्य से सम्पन्न हो जाता है। स्तुति में हम परमात्मा के गुणों की परिगणना करते हैं, जैसे-दयालुता, न्यायकारिता आदि। प्रार्थना में हम परमात्मा से विनम्र मांग करते हैं कि ये समस्त गुण हमारे जीवन में आ जावें। उपासना के द्वारा परमात्मा की  समीपता से नया तेज, नया ओज, नया जीवन उपलब्ध होता है। जीवात्मा स्वपुरुषार्थ से ही परमात्मा की ओर अग्रसर हो सकता है। जीवात्मा और परमात्मा के बीच किसी मध्यस्थ की आवश्यकता नहीं है।

समाज- मनुष्य समाज में रहता है। समाज में ही जन्मता और बढता है। समाज से ही वह भाषा और संस्कृति भी पाता है। इस नाते समाज के प्रति इसका जो दायित्व है उससे वह मुख नहीं मोड़ सकता। ईश्वरीय प्रेम का एक अर्थ समाज की निष्काम सेवा करना भी है। वर्णाश्रम व्यवस्था भी मनुष्य को अधिकारों के स्थान पर कर्त्तव्यों पर अधिक बल देती है। जब समाज कर्त्तव्यों की उपेक्षा कर अधिकारासक्त होता है, तब अव्यवस्था का साम्राज्य स्थापित हो जाता है। किसी भी समाजोपयोगी कार्य को हीन या अधम नहीं मानना चाहिए। कार्यो की गुरुता तथा प्रकृति भिन्न होते हुए भी उसका आध्यात्मिक मूल्य एक समान है। निष्ठा एवं सत्यता-सम्पन्न प्रत्येक कर्म मनुष्य को मुक्ति की ओर ले जाता है। कमजोर वर्ग की सहायता करना और उसकी उन्नति के लिए अवसर प्रदान करना समाज में शान्ति एवं व्यवस्था के लिए अत्यन्त आवश्यक है। केवल शक्तिशाली को ही जीने का अधिकार है, ऐसा मानना सामाजिक सामञ्जस्य के सिद्धान्त पर निर्मम प्रहार है। स्वामी दयानन्द स्वतन्त्रता के साथ-साथ "सर्व-हितकारी" शब्द का पुन:-पुन: प्रयोग करते हैं, क्योंकि स्वच्छन्दता सर्वनाश की जननी है।

सभी समाजों में कर्मकाण्ड का प्रचलन होना आवश्यक है। वैदिक धर्म में जीवन-निर्माणकारी सोलह संस्कारों का अनुपालन जीवन की सत्ता एवं महत्ता के वैदिक आदर्श के अनुसार जीवन का अन्तिम उद्देश्य पाने में परम सहायक है।

आर्यसमाज की मान्यताओं और आस्थाओं के बारे में सार रूप में यह कह दिया गया है कि जीवन के ये आधारभूत सिद्धान्त अखिल मानव-जाति के लिए समान रूप से उपयोगी हैं। हम सभी अमृत-पुत्र, पृथिवी-पुत्र हैं। मानव जाति का मंगल करने वाले सभी विचारक, आचार्य, चिन्तक समान रूप से हमारे लिए आराध्य हैं।

महर्षि दयानन्द ने आर्य समाज की स्थापना द्वारा मानव महिमा का महादान कर मानव को दिव्य गरिमायुक्त करने का महत्‌ प्रयत्न किया। पीड़ित प्रताड़ित मानवता का आह्वान किया और अपने प्रबल उद्‌बोधन से मानवता को प्रगति पथ पर अग्रसर किया।

विज्ञान- मैं आजीवन एक ही सूत्र का प्रचार करता चला आ रहा हूं वह सार सूत्र है- Rationalize your religion Spiritualize your science. धर्म को बौद्धिकता और विज्ञान को आध्यात्मिकता का आधार दो। आर्य समाज का यही मौलिक आधार है। इसी में मनुष्य जाति का मंगल है। विज्ञान ने हमें दैत्याकार शक्तियों का स्वामी बना दिया है। यदि हमने भीतरी आत्मिक शक्ति का विकास नहीं किया तो विज्ञान हमें महाविनाश की ओर ले जाएगा। इसमें सन्देह नहीं कि विज्ञान ने अनेक तथ्यों को समझने में हमारी सहायता की है और अन्धविश्वासों से छुड़ाया है। नयी सम्पन्नताएं भी दीं। विज्ञान नये सृजन का नाम भी हो सकता है और संहार का भी। विज्ञान संसार को स्वर्ग भी बना सकता है और नरक भी। धर्माधारित विज्ञान से ही मनुष्य का कल्याण अवश्य सिद्ध होगा।

अज्ञान और अन्धविश्वास पूरित धर्म अधर्म ही है। ऐसा धर्म जीवन को दु:ख प्रदान करता है। हमें आज के बुद्धिवादी युग में धर्म को तर्क संगत आधार देने होंगे। बुद्धि का दीपक लेकर हमें धर्म-क्षेत्र में भी उतरना होगा। यदि मनुष्य को जीवित रहना है तो विज्ञान को अध्यात्म पर अधिष्ठित करना होगा और धर्म को तर्क संगत आधार देना होगा।

परम मंगलमय शक्ति के सम्मुख विनम्रता का भाव अपना कर निरन्तर सत्यान्वेषण में लगे रहकर मनुष्य जाति के कल्याण के लिए निष्काम भाव से कार्यरत रहें। यही वैदिक धर्म का आदर्श और उद्देश्य है और इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की थी।

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