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दीवाली का देवता और वेद

दीपमाला का पर्व प्रतिवर्ष आता है। भारतवासी देश में हैं अथवा विदेशों में, अपनी-अपनी भावना व धारणा के अनुरूप इसे अपने-अपने स्थानों पर मनाते हैं। पर्व व्यक्ति, परिवार, समाज एवं राष्ट्र के विशाल शरीर व जीवन में समय-समय पर आने वाली न्यूनता अथवा त्रुटियों को पूर्ण करने का एक मौन सन्देश दे जाता है। इस दिन प्रत्येक अपने बही खाता की जांच पड़ताल करता है कि क्या पाया और गंवाया। जहॉं भी किसी प्रकार की हानि हो उसे नये वर्ष से लाभ में बदलने का संकल्प किया जा सकता है। पर्व जीवन में प्रेरणा व चेतना का सबसे बड़ा साधन है। इस की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। आर्यसमाज भी दीवाली का पर्व यत्र-तत्र-सर्वत्र समारोह से मनाता है।

इस पर्व का सम्बन्ध आर्य समाज के महान्‌ संस्थापक महर्षि स्वामी दयानन्द जी सरस्वती के साथ है। इस दिन अजमेर नगर में भिनाय भवन में उस देवता ने अपने भौतिक जीवन की आहुति देकर विश्व को एक महान्‌ सन्देश दिया था। वेद में आता है- मा यज्ञादिन्द्र सोमिन:। हे मनुष्यो! उस वेद प्रचार व धर्म प्रसार के महान्‌ यज्ञ से विचलित मत होना। उस वेद प्रचार के पुनीत पथ पर निरन्तर बढते जाना तथा इस वेद प्रसार के महान्‌ यज्ञ में तन-मन-धन व जीवन की हर प्रकार की आहुति श्रद्धा भावना से भरकर देते चले जाना।

उस देवता दयानन्द ने अपना सारा जीवन लगा दिया। गुरु दीक्षा के बाद वह एक ही व्रत के व्रती बन गये। संकल्प के संकल्पी बने। एक ही कल्प के कल्पकार तथा एक ही पथ के पथिक बनकर महान्‌ कार्य क्षेत्र में उतरे। अपने अन्तिम दिन भी सभी को यही दिव्य सन्देश दिया कि आर्यो ! मेरे पीछे खड़े हो जाओ। कभी-कभी ऋषि सरल सूत्र में सारा सन्देश दे जाते हैं। देव दयानन्द ने अपना जीवन जिस महान्‌ मिशन में अर्पित किया, वह था वेद का विश्व में प्रचार और वैदिक धर्म का सर्वत्र प्रसार। मथुरा गुरुधाम से बाहर कार्यक्षेत्र में आकर वेद प्रचार का कार्य ही उनके जीवन का व्रत बन गया। इतो वेदा: ततो वेदा: सर्वत्र वेदा: एव। इस दिशा में वेद फैले, उस दिशा में वेद फैल जायें, सभी स्थानों पर वेदों का प्रचार होता जाये- यही उनके जीवन का एकमात्र ध्येय बन गया। यही निष्ठा थी, इसी को व्रत का रूप दे दिया। प्रलोभन की चमकीली राहों में तथा लुभाने सुहाने दृश्यों में, भीषण यातनाओं, घोर विपदाओं, भारी अपमान के वातावरण में भी उस वेद प्रचारक, धर्म प्रसारक, विश्व सुधारक, व्रतधारक, सर्वजीवोपकारक, दीन दलितोद्वारक देव दयानन्द का पांव तनिक भी नहीं लड़खड़ाया। न्यायात्पथ: प्रविचलन्ति पदं न धीरा: - के अनुसार न्यायपथ के उस महान पथिक को किसी प्रकार भी विचलित न किया जा सका। ध्रुवस्तिष्ठाविचाचलि: - वेद के शब्दों के अनुसार वह देवता वेद प्रसार के कार्य में अविचल व अविकल अटल रहे।

इस धरती पर समय-समय पर नानाविध व्यक्ति आये, कार्य क्षेत्र में भी उतरे तथा हलचल भी मचाई। किन्तु कुछ समय के बाद पथ से डांवाडोल हो गये। कोई सत्ता के सूत्रों में सम्बद्ध हो गया तो कोई सौन्दर्य का स्तोता बनकर सुन्दरियों का सेवक बन बैठा। कोई गुरुडम का डमरू बजाने लगा। कोई स्वर्ण के भण्डार का भण्डारी बनने में ही मस्त हो गया। कोई भय से ही भाग गया। पर धन्य हैं देव दयानन्द जीवन में जो व्रत लिया उसी पर अटल रहे। उनके सामने काम बेकाम बनकर भागा। सुन्दरियॉं दरियों में जा छिपी। धन का प्रभाव स्वयं प्रभावहीन हो गया। सत्ता अपनी महत्ता समाप्त कर बैठी। दीवाली का देवता दयानन्द अपने वेद प्रचार के महान्‌ पुनीत व्रत में निरन्तर अडिग रहा।

उनका व्रत था वेद का प्रचार। आर्य समाज की स्थापना भी इस महान्‌ कार्य के लिए की गई। पहिले वेद का कोई नाम भी न जानता था। वेद की पवित्र पुस्तक कहीं होगी तो किसी के घर में पता नहीं कहॉं छिपाई थी। वेद मन्त्रों का पाठ व उच्चारण कौन करता था? इस बारे में तो एक धारणा बन गई थी कि वेद को वृत्रासुर ले गया है। अब वेद धरती पर हैं नहीं। अमेरिका में अपने प्रवचनों में स्वामी विवेकानन्द तक ने भी वहॉं की जनता को उत्तर दिया कि वेद तो अब हैं नहीं? शंकर ने अपने वेदान्त भाष्य में वेदों के सार्वजनिक पठन-पाठन, श्रवण-श्रावण पर प्रतिबन्ध लगा दिया था।

दूसरी ओर वेदों को बदनाम करने में भी उस समय के विद्वानों ने कोई भी कसर नहीं उठा रखी थी। यज्ञों में क्या था? वेदमन्त्रों को किस-किस प्रसंग में लगा रहे थे। सायण हो या महीधर, इन लोगों ने मन्त्रों के भाष्य में वह पाप किया जो रहती दुनिया उनको कलंकित करता रहेगा। ऐसा पापमय भाष्य करते उनको तनिक भी लज्जा नहीं आई। सातों समुद्रों का जल भी उनके इस कलंक को धो नहीं सकेगा।

स्वामी दयानन्द वेदों वाले थे। वेद उनको बहुत प्यारे थे। यह इनकी निष्ठा थी कि वेदों का सर्वत्र प्रचार हो। बाकी सभी बातें गौण थी, पर वेद प्रमुख था। दीवाली पर अन्तिम समय में भी यही सन्देश दिया कि मेरे पीछे खड़े हो जाओ। जो वेद प्रचार का कार्य मैं करता रहा हूँ, उसी को करते जाना। वेद पथ पर चलते रहना। अत: स्वामी दयानन्द जी का सबसे बड़ा यही प्रमुख सन्देश है कि वेदों को घर-घर जन-जन तक पहुँचा दो। वेद के बिना कोई परिवार, कोई संस्था, कोई प्रदेश, मनुष्य न रहे। यह उस देवता दयानन्द का सबसे प्रमुख दिव्य सन्देश है। - त्रिलोक चन्द्र शास्त्री

 

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Ved Katha Pravachan -7 (Explanation of Vedas) वेद कथा - प्रवचन एवं व्याख्यान Ved Gyan Katha Divya Pravachan & Vedas explained (Introduction to the Vedas, Explanation of Vedas & Vaidik Mantras in Hindi) by Acharya Dr. Sanjay Dev

 

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