Established in: 1875 at Mumbai

Arya Samaj Mandir Bank Colony, Indore is run under aegis of Divyayug Nirman Trust. Divyayug Nirman Trust is an Eduactional, social, religious and charitable trust registered under MP Public Trust Act 1951. Arya Samaj Mandir Bank Colony, Indore is the only Mandir controlled by Divyayug Nirman Trust. We do not have any other branch or Centre in Indore.Kindly ensure that you are solemnising your marriage with a registered organisation and do not get mislead by large Buildings or Hall. "आर्यसमाज मन्दिर, बैंक कालोनी, इन्दौर" दिव्ययुग निर्माण ट्रस्ट द्वारा संचालित इन्दौर में एकमात्र मन्दिर है। म.प्र. पब्लिक ट्रस्ट एक्ट 1951 के अन्तर्गत पंजीकृत दिव्ययुग निर्माण ट्रस्ट एक शैक्षणिक-सामाजिक-धार्मिक-पारमार्थिक ट्रस्ट है। आर्यसमाज मन्दिर बैंक कालोनी के अतिरिक्त इन्दौर में दिव्ययुग निर्माण ट्रस्ट की अन्य कोई शाखा या आर्यसमाज मन्दिर नहीं है। विशेष सूचना- Arya Samaj तथा Arya Samaj Marriage और इससे मिलते-जुलते नामों से Internet पर अनेक फर्जी वेबसाईट एवं गुमराह करने वाले आकर्षक विज्ञापन प्रसारित हो रहे हैं। अत: जनहित में सूचना दी जाती है कि इनसे आर्यसमाज विधि से विवाह संस्कार व्यवस्था अथवा अन्य किसी भी प्रकार का व्यवहार करते समय यह पूरी तरह सुनिश्चित कर लें कि इनके द्वारा किया जा रहा कार्य पूरी तरह वैधानिक है अथवा नहीं।

भारत-भाग्य विधाता महर्षि दयानन्द सरस्वती - 1.2

कुछ लोगों का कहना है कि हम मूर्त्तियों को ईश्वर नहीं मानते, हम उन्हें केवल मानसिक विकास का साधन मानते हैं। इस पर राजा राममोहन राय का कहना था-

“Hindus of the present age have not the least idea that it is the attributes of the Supreme Being as figuratively represented by Shapes corresponding to the nature of those attributes, they offer adoration and worship under the denomination of gods and godesses.

 On the contrary, the slightest investigation will clearly satisfy any inquirer, that it makes a material part of their system to hold as articles of faith all those particular circumstances, which are essential to the belief in the independent existence of the objects of their idolatory of deities clothed with divine power.” -English works of Rammohan Rai. Page 71

आशय यह है कि वर्त्तमान युग के हिन्दुओं को यह ज्ञान नहीं कि जिन देवी-देवताओं की वे पूजा करते हैं वे परब्रह्म के ही प्रतिनिधिरूप हैं। थोडी-सी जॉंच से पता चल जाएगा कि वे लोग उनकी संज्ञा स्वीकार करते हैं और ईश्वर मानकर ही उनकी पूजा करते हैं।

जब ईसाइयों ने तन्त्रों और पुराणों के आधार पर ईश्वर के अवतार लेने की आलोचना की तो राजा राममोहन राय ने लिखा-

“तुम लोग हिन्दुओं के अवतारों पर आक्षेप करते हो, परन्तु क्या तुम ईसा को जो मनुष्य के रूप में है और पवित्र आत्मा को जो पक्षी के रूप में है, ईश्वर नहीं मानते हो? क्या तुम नहीं मानते कि ईसामसीह खुदा ही था? क्या उसमें मानवीयभाव नहीं था? क्या वह क्रोध नहीं करता था? क्या उसे दु:खों का अनुभव नहीं होता था? क्या वह बहुत समय तक सम्बन्धियों के साथ नहीं रहा? क्या पक्षीरूपी उस पवित्र आत्मा ने स्त्री के प्रसंग से ईसा को पैदा नहीं किया था? क्या उसकी मृत्यु नहीं हुई थी? यदि ईसाई लोग इन बातों का मानते हैं तो वे पुराणों की बातों पर कैसे आक्षेप कर सकते हैं? पुराणों में जो बात वेदविरुद्ध है, उसे हिन्दू नहीं मानते, परन्तु ईसाइयों का तो बाइबल ही वेद है। इसलिए सबसे अधिक ईसाई ही दोषी ठहरते हैं।”

इसके उपरान्त राजा राममोहन राय ने ईसाइयों से निम्नलिखित प्रश्न किये -

1. तुम ईसा को ईश्वर भी मानते हो और ईश्वर का बेटा भी। बेटा बाप कैसे हो सकता है?

2. वे कभी-कभी कहते हैं कि ईसा मनुष्य का बेटा था। फिर भी कहते हैं कि कोई मनुष्य उसका बाप नहीं था।

3. वे कहते हैं कि ईश्वर एक है । फिर भी कहते हैं कि बाप ईश्वर है, बेटा ईश्वर है और पवित्र आत्मा ईश्वर है।

4. वे कहते हैं कि ईश्वर की पूजा करनी चाहिए, फिर भी वे शरीरधारी ईसा की पूजा करते हैं।

यह सब राममोहन राय ने उस लेख के उत्तर में लिखा था जो श्रीरामपुर स्थित मिशन प्रेस से प्रकाशित होने वाले ‘समाचार दर्पण’ के 14 जुलाई 1821 के अंक में छपा था। इस लेख में किसी ईसाई द्वारा हिन्दू धर्म और शास्त्रों पर आक्षेप किये गये थे।

मौर्यकाल के बाद पुष्यमित्र के समय में जिस धर्म का पोषण किया गया उसे ब्राह्मण धर्म के नाम से अभिहित किया गया। ऋषि दयानन्द ने उसे पौराणिक धर्म कहा। यहॉं  धर्म शब्द का प्रयोग वर्त्तमान में रूढ अर्थो में किया जा रहा है। यह धर्म अपनी परम्परा के अनुरूप सदा राज्य का आश्रय लेता रहा। मध्यकाल में इस वर्ग ने इस्लाम की सहायता से अपना प्रभुत्व बनाये रक्खा। इसी के कारण सिन्धी भाषा अरबी अक्षरों में लिखी जाने लगी। यह वर्ग “स्वार्थसिद्धये राज्याय नमो नम:” अथवा “यथा राजा तथा प्रजा” में विश्वास रखता था। अंग्रेजों के युग में इस वर्ग ने नौकरियॉं पाने के लिए अंग्रेजी को अपनाया। भाषा के साथ उसके साहित्य का और साहित्य के साथ उसकी सभ्यता और संस्कृति का तो गहरा सम्बन्ध है ही, कालान्तर में उसकी अस्मिता भी उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहती।

राजा राममोहन राय प्रतिभाशाली पुरुष थे। उनके चिन्तन में मौलिकता थी। उन्होंने अनुभव किया कि यदि हिन्दू धर्म को जीवित रहना है तो उसके वर्तमान रूप को सुधारना होगा। न हिन्दू धर्म को ज्यों-का-त्यों चिपटाये रहने से काम चलेगा और न उसका त्याग करके ईसाइयत को अपनाने से कल्याण होगा। इसलिए उन्होंने मध्यम मार्ग अपनाने का प्रयास किया, परन्तु इस प्रयास में वे धीरे-धीरे अपना सन्तुलन खोने लगे। अपने Autobiographical Sketch में उन्होंने लिखा -

“Finding thme generally more intelligent, more steady and moderate in their condust, I gave up my prejudice against them and became inclined in their favour, feeling persuaded that their rule, though a foreign yoke, would lead more speadily and surely to the amelioration of the native inhabitants.”

अर्थात्‌ जब मुझे यह ज्ञात हुआ कि ये (अंग्रेज) अधिक बुद्धिमान्‌, अधिक धैर्यवान्‌ और व्यवहार में अधिक सन्तुलित होते हैं तो उनके प्रति मेरा पूर्वाग्रह जाता रहा और मैं उनके अनुकूल होता गया। मुझे विश्वास हो गया कि उनका राज्य विदेशी होते हुए भी भारतवासियों की उन्नति के लिए निश्चित रूप से अधिक हितकर है।

ये शब्द राजा राममोहन राय की हीन-भावना के द्योतक तथा अत्याचारी विदेशी शासकों की ठकुरसुहाती के साक्षी हैं। इससे स्पष्ट है कि राजा राममोहन राय की धार्मिक अवधारणा (ब्राह्मसमाज) विशुद्ध भारतीय न होकर ईसाइयत से प्रभावित थी। इस विषय में रोम्यॉं रोलॉं (Romain Rolland) के अनुसार “राजा राममोहन राय ने जहॉं से आरम्भ किया था वह मार्टिन लूथर द्वारा प्रवर्त्तित प्रोटेस्टेण्ट एकेश्वरवाद था। उसके पूर्णरूप से ईसाइयत में विलीन होने के कारण भारतीय जनसाधारण का उसमें विश्वास नहीं रहा था। (रोम्यॉं रोलॉं-राम कृष्ण परमहंस, पृ.155) । यही कारण था कि राजा राममोहन राय ने मैकाले की उस अंग्रेजी शिक्षा-व्यवस्था का समर्थन किया जो मैकाले के अनुसार भारतीयों की प्रवृत्ति, सम्मति, नैतिकता एवं प्रज्ञा में अंग्रेज-ईसाई बनाने का सुनियोजित षड्‌यन्त्र था।” -पी0 वी0 काणे, धर्मशास्त्र का इतिहास, भाग 5, पृ0 416.                         लेखक- स्वामी विद्यानन्द सरस्वती

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