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भारत-भाग्य विधाता महर्षि दयानन्द सरस्वती -1.3

स्वयं मैकाले ने लिखा था-

“We must do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern a class of persons Indian in blood and clour, but English in taste, in opinions, words and intellect”.

अर्थात्‌ हमें इस देश में एक ऐसा वर्ग पैदा करने का यत्न करना चाहिए जो हमारे और हमारे द्वारा शासित करोडों भारतीयों के बीच दुभाषियों का काम कर सके। यह वर्ग हाड़-मांस और रङ्ग से भले ही भारतीय लगे, परन्तु आचार-विचार, रहन-सहन, बोल-चाल और दिल-दिमाग से अंग्रेज बन जाए।

इस प्रयास में अंग्रेजों की सफलता का विवरण भी मैकाले के ही शब्दों में मिल जाता है। सन्‌ 1836 में उसने अपने चाचा को एक पत्र में लिखा था-

“No Hindu, who has received English education, ever remains sincerely attached to his religion. Some continue to profess it as a matter of policy, but many profess themselves pure theists and some embrace christianity. It is my firm belief that if our plans of education are followed up, there will not be a single idolator among the respectable classes in Bengal thirty years hence.”

अर्थात्‌ जो भी हिन्दू अंग्रेजी-शिक्षा ग्रहण कर लेता है, वह अपने धर्म में सच्ची श्रद्धा और विश्वास खो बैठता है। कुछ केवल दिखावे के लिए उसे मानते रहते हैं। अधिकतर विशुद्ध नास्तिक बनकर रह जाते हैं या ईसाई बन जाते हैं। मेरा पक्का और निश्चित विश्वास है कि यदि हमारी योजना के अनुसार कार्य होता रहा तो अब से तीस वर्ष बाद बंगाल के प्रतिष्ठित घरानों में एक भी हिन्दू नहीं बचेगा।

मैकाले की शिक्षानीति पर आधुनिक सन्दर्भ में टिप्पणी करते हुए डॉ0 राधाकृष्णन ने लिखा है-

“The policy inaugurated by Macaulay is so careful as not to make us forget the force and vitality of Western culture, it has not helped us to love our own culture. In some cases Macaulay’s wish is fulfilled and we have educated Indians who are ‘more English themselves’ to quote Macaulay’s own words.”

आशय यह है कि मैकाले की शिक्षानीति के अनुसार शिक्षित भारतीय स्वयं अंग्रेजों की अपेक्षा अधिक अंग्रेज हो गये हैं।

राजा राममोहन राय ने मैकाले की शिक्षा-नीति का समर्थन ही नहीं किया, अपितु सन्‌ 1822 में स्वयं एक अंग्रेजी स्कूल की स्थापना की। इतना ही नहीं, “सन्‌ 1823 में गवर्नर जनरल लार्ड एमरहर्स्ट को पत्र लिखकर कलकत्ता में बंगाल सरकार द्वारा स्थापित किये जा रहे संस्कृत कॉलिज को अनावश्यक तथा भारतीयों की उन्नति में बाधक भी बताया।” - आर0 एन0 सरकार, राजा राममोहन राय, पृष्ठ 24-25

राजा राममोहन राय का मन्तव्य था- “Though a foreign yoke the British rule would lead more speadily and surely to the amelioration of the native inhabitants.” 

एक सार्वभौमिक और सार्वकालिक सिद्धान्त है- “Good government is no substitute for self-government” अर्थात्‌ सुराज्य भी स्वराज्य का विकल्प नहीं होता। फिर अंग्रेज तो भारत में व्यापारी ही बनकर आये थे। व्यापार के लिए उन्होंने ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना की थी। धीरे-धीरे यही कम्पनी भारत में अंग्रेजी शासन का आधार बन गई। उसकी अपनी सेना थी। इस सेना और भारतीय रियासतों के परस्पर संघर्ष के फलस्वरूप वह देश पर अपना अधिकार करती गई। 1849 में पंजाब पर विजय के साथ उसका अभियान पूरा हो गया और समूचे भारत पर यूनियन जैक फहराने लगा, परन्तु विज्ञान का नियम है- “To every action there is an equal and opposite reaction.”

अर्थात्‌ प्रत्येक क्रिया की उतनी ही जोरदार और विरोधी प्रतिक्रिया होती है। भारतीयों के भीतर विद्रोह की आग सुलगने लगी। यह 10 मई 1857 को ज्वाला बनकर भड़क उठी और देश के कोने-कोने में फैल गई, परन्तु कुछ ही दिनों में यह आग ठण्डी पड गई। ठण्डी पड जाने पर भी यह बुझी नहीं। उस क्रिया की प्रतिक्रिया अवश्यम्भावी थी।  लेखक- स्वामी विद्यानन्द सरस्वती

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