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समय के प्रवाह को बदलने वाले

लोग कहते हैं कि बदलता है जमाना अक्सर।               

मर्द वो हैं जो जमाने को बदल देते हैं।

समय के प्रवाह के साथ प्रायः सभी वह जाते हैं। कोई विरला ही ऐसा महामानव होता है, जो समय के प्रवाह को बदलने में समर्थ होता है। ऐसे महामानव इतिहास में अपना नाम अमर कर जाते हैं। ""श्रीयुत स्वामी श्रद्धानन्द जी उन महामना मनुष्यधुरीणों में से थे, जो समय की उपज नहीं होते, अपितु समय को बनाया करते हैं। साधारणतया नेता लोकरुचि का प्रवाह देखकर उसमें वेग या प्रचण्डता पैदा करके ख्याति प्राप्त किया करते हैं। श्रद्धानन्द इसका अपवाद हैं।'' ये वाक्य एक अन्य संन्यासी स्वामी वेदानन्द जी तीर्थ के हैं, जो अक्षरशः   सत्य हैं। अपने कथन की पुष्टि में श्री स्वामी वेदानन्द जी तीर्थ गुरुकुल स्थापना का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं कि- '"जिस समय महात्मा मुन्शीराम जी ने इसकी स्थापना का संकल्प किया, उस समय लोगों में इसके लिए कोई अनुकूल भावना न  थी, कदाचित्‌ प्रतिकूल भावना भी जागृत न थी। श्रद्धानन्द जी को सत्यार्थप्रकाश से गुरुकुल शिक्षा प्रणाली का एक भाव मिला। उसको उन्होंने समय प्रवाह की परवाह न करते हुए मूर्तरूप दे ही डाला। यह  है उनकी निर्माण कुशलता और इसी कारण वे असाधारण महापुरुष की पंक्ति में समादृत हुए हैं और आचन्द्रदिवाकर होते रहेंगे।'' 

प्रवाह के विरुद्ध- उस समय गुरुकुल शिक्षा प्रणाली की विचारधारा को क्रियान्वित करना कोई बच्चों का खेल नहीं था। नई कालेजी शिक्षा के बढ़ते काल में प्राचीन गुरुकुल शिक्षापद्धति को प्रचलित करना स्वयं में एक समस्या थी। लोगों के मन में प्रायः यह शंका उठा करती थी कि केवल संस्कृत पढ़ा व्यक्ति अपनी आजीविका कैसे अर्जित कर पायेगा? कोई कहता था कि माता-पिता के बिना बच्चे गुरुकुल में कैसे रह पायेंगे? फिर उसके लिए धन जुटना कोई सरल बात नहीं थी। इस सम्बन्ध में पं. इन्द्र विद्यावचस्पति लिखते हैं कि- ""आज तीस हजार रुपये इकट्‌ठा करना बच्चों का खेल मालूम होता है। परन्तु तब गुरुकुल के लिये तीस रुपये भी एकत्र करना असम्भव सा प्रतीत होता था। जब हितैषियों ने पिता जी की बात सुनी तो यह समझा कि इस व्यक्ति का दिमाग फिर गया है। लोग यह भी नहीं जानते थे कि "गुरुकुल' किस चिड़िया का नाम है?'' 

आर्यसमाज लाहौर के वाषिकोत्सव पर आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब का भी अधिवेशन चल रहा था। उसमें गुरुकुल स्थापना का विषय उपस्थित हुआ। पक्ष-विपक्ष में अनेक वक्ता बोल चुके। किन्तु विवाद था कि समाप्त होने में ही न आ रहा था। इतने में एक सदस्य खोल उठा- "अच्छा प्रधान जी! अब आपकी भी सुननी चाहिए। प्रधान थे श्री स्वामी श्रद्धानन्द जी महाराज। वे अपने आसन से उठे और अति गम्भीर भाव से चारों ओर दृष्टि डालकर ब्रह्मचर्याश्रमपूर्वक गुरुकुल शिक्षा-पद्धति पर प्रकाश डालने लगे। इतने में जनता में से एक धीमी सी आवाज फिर उठी कि- "धन कहॉं से आयेगा?'' बस फिर क्या था, प्रधान जी गरज उठे- '"मुन्शीराम जब तक तीस हजार न जमा कर लेगा, घर में घुसना उसके लिये हराम होगा।'' बस इस घोषणा के साथ समय ने नया मोड़ लिया और यह विवाद कि गुरुकुल खोला जाये या नहीं समाप्त हो गया। फिर भी लोगों के मन में यह शंका बनी रही कि यह वकील साहब इतना धन कैसा इकट्‌ठा कर पायेंगे?

इस सम्बन्ध में पं. सत्यदेव विद्यालंकार का कथन है कि तीस हजार रुपया इकट्‌ठा करना उस समय मामूली बात न थी। पर वह था धुन का पक्का। उसे यह सवाल हल करना ही था कि "कौमें पागलों के पीछे होती हैं।'' और वस्तुतः गुरुकुल-शिक्षा प्रणाली के लिए पागल उस महामानव ने यह कार्य कर दिखाया। गुरुकुल की स्थापना हुई। अब प्रश्न था कि बच्चे कहॉं से आयेंगे। तब उस दीवाने ने सबसे पहले अपने बच्चे इस कार्य के लिए समर्पित किये और शिक्षक के रूप में भी स्वयं को प्रस्तुत कर दिया। इस प्रकार जो विचार एक स्वप्न सा दिखाई देता था, वह साकार हो उठा और समय मुंह ताकता रह गया। 

चुनौती का सामना- स्वामी जी के जीवन में एक अवसर और आया, जब उन्होंने समय की चुनौती को स्वीकारा और उसे पराजित करके रख दिया। जलियांवाला बाग में जनरल डायर द्वारा भयंकर नरसंहार के बाद अमृतसर में कांग्रेस का अधिवेशन होना था, जिसकी अध्यक्षता मोतीलाल नेहरू को करनी थी। परन्तु इस भयंकर नरसंहार के बाद अमृतसर की जनता इतनी भयभीत थी कि कोई कांग्रेस का नाम तक लेने को तैयार न था। परिणाम यह हुआ कि स्वागताध्यक्ष बनने को कोई तैयार न हुआ। अन्त में सबकी नजर स्वामी श्रद्धानन्द पर गई और स्वामी जी ने समय की इस चुनौती को स्वीकार कर लिया। 

एक बड़े से सूखे तालाब के बीचों-बीच गहरे स्थान पर ऊंचा सा मञ्च बनाया गया। चारों ओर दर्शक-दीर्घाएं बनाई गई। एक ओर प्रेस-प्रतिनिधियों के लिए स्थान निर्धारित किया गया । इस प्रकार एक बहुत बड़ा पण्डाल बनकर तैयार हो गया। प्रतिनिधियों और स्वयंसेवकों के निवास के लिए छोलदारियां और तम्बू लगाये गये। अधिवेशन में दो-तीन दिन ही शेष थे कि एक दिन भयंकर तूफान के साथ मूसलाधार वर्षा और आन्धी आ गई, जिससे सारा पण्डाल ध्वस्त हो गया और अधिवेशन स्थल पानी से भर गया। अब और पण्डाल बनाने के लिये न तो समय था और न ही स्थान। ऐसी विषम परिस्थिति में कांग्रेस के अधिकारियों ने यही उचित समझा कि इस वर्ष का अधिवेशन स्थगित कर दिया जाये। 

पर आपदाओं के साथ टक्कर लेने में अभ्यस्त स्वामी जी इसके लिये तैयार न हुए। उन्होंने घोषणा कर दी कि कांग्रेस का अधिवेशन अवश्य होगा और पूर्व-निर्धारित तिथियों में ही होगा। सभी आश्चर्यचकित थे कि यह कैसा व्यक्ति है, जो परिस्थितियों के आगे झुकना जानता ही नहीं और हर असम्भव बात को सम्भव कर दिखाना बड़ा सहज समझता है। स्वामी जी ने अमृतसरवासियों के नाम एक अपील जारी की और ऐसी विषम परिस्थिति में हरसम्भव सहायता के लिए प्रेरित किया। 

बस फिर क्या था, नगर के सैकड़ों व्यापारी एवं स्वयंसेवक एकत्र होकर सेवा करने के लिए आगे आये और सबके सब परस्पर कन्धे से कन्धा मिलाकर अधिवेशन को सफल बनाने के काम में जुट गये। 15-20 पम्पसैट लगाकर पण्डाल का सारा पानी निकाला गया, सारे मलबे का ढेर एक ओर हटाकर उस पर सूखी राख बिछा दी गई। दोबारा बृहत्‌ पण्डाल तैयार किया गया और पूरी तैयारी हो गई। लगता था कि जैसे कुछ हुआ ही न हो। केवल प्रतिनिधियों को ठहराने की व्यवस्था शेष रह गई। 

स्वामी जी ने पुनः एक अपील जारी की कि प्रत्येक अमृतसर निवासी कम से कम एक अतिथि को अपने यहॉं ठहराने और भोजन आदि की व्यवस्था करें। स्वामी जी की इस अपील पर सैकड़ों आर्यसमाजी स्टेशन पर पहुंच गये और अपनी-अपनी सामर्थ्यानुसार अतिथियों को अपने घर लिवा ले गये। इस प्रकार हजारों अतिथियों के निवास, भोजन आदि की व्यवस्था की समस्या का चुटकियों में समाधान हो गया। यह कार्य स्वामी श्रद्धानन्द जी जैसे दृढ़संकल्प वाले व्यक्ति के ही बस का था और उन्होंने इसे करके भी दिखा दिया। लक्ष्य है-

बहादुर कब किसी का अहसान लेते हैं?                                     

वही वो कर गुजरते हैं, जो दिल में ठान लेते हैं।

वस्तुतः स्वामी श्रद्धानन्द समय की हर चुनौती का सामना करने के लिए सदैव समुद्यत रहते थे। वे समय के दास नहीं थे, समय के निर्माता थे। -आचार्य डॉ.संजयदेव

स्वामी श्रद्धानन्द 

चरण स्पर्शों से उन्हीं के पूत गंगाधर थी। 

वाणियों से वेद सरिता प्रेम की आगार थी।। 

ज्ञान से था बुद्ध आत्मा, सत्य से मन शुद्ध था। 

मानवी कल्याण तप से, आत्म तेज प्रबुद्ध था।। 

सब जनो की उन्नति में, एक उनका ध्यान था। 

आर्य होवे जगत्‌ सारा, मनुज मात्र समान था।। 

परम श्रद्धानन्द थे वे, ओज की इक मूर्ति थे। 

त्याग और बलिदान में भी, आहुति की मूर्ति थे।। 

देश सेवा जाति सेवा ध्येय था, इक लक्ष्य था। 

दलित सेवा में बताओ, कौन जो समकक्ष था।। 

आर्य संस्कृति धर्म वैदिक में उन्हें विश्वास था। 

दास थे जो मनुजता के, जग उन्हीं का दास था।। 

                                   -डॉ. इन्द्रसेन जेतली

 

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