Established in: 1875 at Mumbai

विशेष सूचना - Arya Samaj, Arya Samaj Mandir तथा Arya Samaj Marriage और इससे मिलते-जुलते नामों से Internet पर अनेक फर्जी वेबसाईट एवं गुमराह करने वाले आकर्षक विज्ञापन प्रसारित हो रहे हैं। अत: जनहित में सूचना दी जाती है कि इनसे आर्यसमाज विधि से विवाह संस्कार व्यवस्था अथवा अन्य किसी भी प्रकार का व्यवहार करते समय यह पूरी तरह सुनिश्चित कर लें कि इनके द्वारा किया जा रहा कार्य पूरी तरह वैधानिक है अथवा नहीं। "आर्यसमाज मन्दिर बैंक कालोनी अन्नपूर्णा इन्दौर" अखिल भारत आर्यसमाज ट्रस्ट द्वारा संचालित इन्दौर में एकमात्र मन्दिर है। भारतीय पब्लिक ट्रस्ट एक्ट (Indian Public Trust Act) के अन्तर्गत पंजीकृत अखिल भारत आर्यसमाज ट्रस्ट एक शैक्षणिक-सामाजिक-धार्मिक-पारमार्थिक ट्रस्ट है। आर्यसमाज मन्दिर बैंक कालोनी के अतिरिक्त इन्दौर में अखिल भारत आर्यसमाज ट्रस्ट की अन्य कोई शाखा या आर्यसमाज मन्दिर नहीं है। Arya Samaj Mandir Bank Colony Annapurna Indore is run under aegis of Akhil Bharat Arya Samaj Trust. Akhil Bharat Arya Samaj Trust is an Eduactional, Social, Religious and Charitable Trust Registered under Indian Public Trust Act. Arya Samaj Mandir Annapurna Indore is the only Mandir controlled by Akhil Bharat Arya Samaj Trust in Indore. We do not have any other branch or Centre in Indore. Kindly ensure that you are solemnising your marriage with a registered organisation and do not get mislead by large Buildings or Hall.

बहुआयामी व्यक्तित्व स्वामी श्रद्धानन्द

बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी स्वामी श्रद्धानन्द का जन्म पंजाब के तलवन नामक गॉंव में 23 फरवरी 1857 को हुआ था। उनका पहला नाम बृहस्पति था, परन्तु बाद में उन्हें मुंशीराम कहा जाने लगा। 1917 में संन्यास के बाद उनका नाम स्वामी श्रद्धानन्द हुआ। उनके पिता नानकचन्द थे। उनकी शिक्षा-दीक्षा बनारस और लाहौर में हुई। उनका विवाह श्रीमती शिवदेवी से हुआ, जो 35 वर्ष की अवस्था में अपने दो पुत्रों तथा दो पुत्रियों को छोड़कर चल बसी। मुन्शीराम नायब तहसीलदार बने। उन्होंने यह नौकरी छोड़कर फिल्लौर में और बाद में जालन्धर में वकालत शुरू कर दी। यहॉं भी उनका मन नहीं लगा और वे स्वामी दयानन्द की प्रेरणा से आर्यसमाज के क्षेत्र में प्रवृत्त हुए। उन्होंने 4 मार्च 1902 को वैदिक ऋषियों के आदर्शों के अनुरूप राष्ट्र के लिए समर्पित नवयुवक तैयार करने हेतु गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना की। 

दक्षिण अफ्रीका से लौटकर महात्मा गांधी गुरुकुल कांगड़ी में आए। महात्मा मुन्शीराम से उनका मेलजोल बढ़ा और वे भी देश को स्वाधीन कराने की राह पर चल पड़े। मोहनदास कर्मचन्द गांधी को उन्होंने 'महात्मा' की उपाधि से विभूषित किया। 1917 में वे संन्यासी हो गए। वे दिल्ली आकर रहने लगे। यहॉं उन्होंने दलितों और अनाथों के लिए संस्थाएं बनायी। यहॉं से उर्दू में "तेज' और हिन्दी में "अर्जुन' नामक समाचार पत्र निकाला। उन्होंने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध हड़तालों तथा धरना-प्रदर्शनों का आयोजन किया। रौलट एक्ट का विरोध किया। सैनिकों की संगीनों का छाती तानकर सामना किया। जामा मस्जिद से व्याख्यान देने वाले वे पहले और आखिरी हिन्दू थे। वे हिन्दुओं तथा मुसलमानों सभी के रहनुमा थे, उनका जीवन त्याग और तपस्या से परिपूर्ण था। उन्होंने 23 दिसम्बर 1926 को अन्तिम सांस ली। भारत सरकार ने उनकी स्मृति में 30 मार्च 1970 को एक डाक टिकट जारी किया था। शताब्दी वर्ष 2002 में भारत सरकार ने गुरुकुल कांगड़ी पर डाक टिकट जारी किया। 

स्वामी श्रद्धानन्द के प्रयास से जलियांवाला बाग काण्ड के बाद अमृतसर में कांग्रेस का महाअधिवेशन हुआ था। उसमें कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता उपस्थित थे। पं. मोतीलाल नेहरू और महामना मदनमोहन मालवीय उस समय कांग्रेस के अग्रणी कार्यकर्त्ता थे। स्वामी श्रद्धानन्द उस समारोह के स्वागताध्यक्ष थे। स्वामी जी ने उस समय देशवासियों को चार परामर्श दिए थे- 

1. केवल इतनी आवश्यकता है कि आर्य लोग अपने आचरण को उत्तम बनाकर दीपक बनें, ताकि उनसे दूसरे दीपक जलाए जा सकें। 

2. सभी प्रान्तों में मैंने देखा है कि हिन्दू और मुसलमान एक दूसरे पर सन्देह करने लगे हैं। किन्तु हिन्दू सामाजिक दृष्टि से बिखरे हुए हैं। मेरी सम्मति में इसका उपाय एक ही है कि हिन्दू नेता हिन्दू समाज को सामाजिक दृष्टि से संगठित करें और मुसलमान नेता खिलाफत की अपेक्षा स्वराज्य की प्राप्ति पर अधिक ध्यान दें। 

3. यदि देश और जाति को स्वतन्त्र देखना चाहते हो तो स्वयं सदाचार की मूर्ति बनकर अपनी सन्तान में सदाचार की बुनियाद रखो। जब सदाचारी-ब्रह्मचारी शिक्षक हों और कौमी हो शिक्षा पद्धति, तब ही कौम की जरूरत पूरी करने वाले नौजवान निकलेंगे। अन्यथा अपनी सन्तान विदेशी विचारों और विदेशी सभ्यता की गुलाम बनकर रहेगी। 

4. ईसाई मुक्ति फौज भारत के साढ़े छः करोड़ अछूतों को विशेष अधिकार दिलाने के लिए प्रयत्नशील हैै। क्योंकि वे भारत में ब्रिटिश सरकार के जहाज के लिए लंगर के समान हैं। आज से ये साढ़े छः करोड़ हमारे लिए अछूत नहीं रहे, बल्कि हमारे भाई-बहन हैं, हमारे पुत्र-पुत्रियॉं हैं। उन्हें मातृभूमि के प्रेम जल से शुद्ध करो। उन्हें पाठशालाओं में पढ़ाओ। उनके गृहस्थ नर-नारियों को अपने सामाजिक व्यवहार में सम्मिलित करो। 

स्वामी जी महाराज ने ये चार परामर्श दिये थे। ये भारतीयता की रक्षा के इतिहास में, भारतीय गौरव की पुनःस्थापना के इतिहास में तथा वैदिक धर्म के प्रसार के इतिहास में प्रकाश-स्तम्भ के समान हैं। पहली बात में उन्होंने सम्पूर्ण आर्यजाति का आह्वान किया है कि वे दीपक के समान तेजस्वी हों। वे दीपक के समान मार्गदर्शक होकर अपने आपको तिल-तिल करके होम कर देने वाले हों। निश्चय ही उनका अपना जीवन दीपक था। उन्होंने दूसरों को मार्ग दिखाया। उन्होंने अपने आपको दीपक के समान जला दिया। उन्होंने देश और जाति की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व त्याग कर दिया। उन्होंने तो सर्वमेध यज्ञ किया था। वे प्रारम्भिक जीवन में क्या थे, सभी जानते हैं। पर आगे चलकर उन्होंने अपने आपको कितना आचारवान्‌ बनाया, यह भी किसी से छिपा नहीं है। वे सार्वजनिक जीवन के व्यक्ति थे। सार्वजनिक व्यक्ति का कोई व्यक्तिगत जीवन नहीं होता। उसका तो एक-एक क्षण सबके सामने होता है। उसका कोई भी कार्य अपने लिए नहीं होता। उसके सभी कार्य दूसरों के लिए होेते हैं। स्वामी श्रद्धानन्द का जीवन स्वच्छ दर्पण के समान आभासमान था। संस्थाओं के सर्वोच्च अधिकारियों को उनके जीवन से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। उन्हें सदाचारी बनना चाहिए। उन्हें प्रकाशस्तम्भ बनना चाहिए। 

स्वामी जी महाराज ने हिन्दू जाति के संगठन की बात कही है। यह बात आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। यदि हमें कुछ पाना है, अपने राष्ट्र का उद्धार करना है, आर्य जाति को प्रगति के पथ पर लाना है तथा आर्य जाति को गौरवान्वित करना है, तो हमें संगठित होना ही होगा। संगच्छध्वं  संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्‌का नाद गुंजाना ही होगा। आज हमारे अनेक भाई छोटे-छोटे विवादों में फंसे हैं। वे उस बृहद उद्देश्य को भूल चुके हैं, जो ऋषि ने हमें बताया था तथा जिस मार्ग पर स्वामी श्रद्धानन्द चले थे। संगठनात्मक दृष्यि से आज भी सुदृढ़ता की आवश्यकता है। स्वामी श्रद्धानन्द एक शहीद की मौत मरे। हर किसी की कामना हो सकती है कि वह शहीद की मौत मरे। पर शहीद वही होता है जो किसी उद्देश्य के लिए अपने को न्योछावर करे।  स्वामी श्रद्धानन्द ने उसी संगठनात्मक सुदढ़ता और एकता के लिए अपने जीवन का बलिदान किया। वह तो वीर पुरुष थे। वे वीरता की ही मृत्यु को प्राप्त हुए। कायर लोग अपने जीवम में अनेक बार मरते हैं। वे जब भी डरेंगे, तभी मरेंगे। परन्तु वे बहादुर ही सदा याद किये जाएंगे, जो निर्भीक होंगे, अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील होंगे। 

स्वामी जी ने अपनी सन्तान को सदाचारी बनाने की बात कही है। 'जनया दैव्यम्‌ जनम्‌' यह वेद का आदेश है। स्वयं सदाचारी बनो तथा अपनी सन्तति को सदाचारी बनाओ। स्वामी श्रद्धानन्द ने गुरुकुल शिक्षा पद्धति के माध्यम से दिव्य व्यक्तित्वों के निर्माण की बात अपने मन में सोची थी। उनका सपना सच हुआ। गुरुकुल के सैकड़ों स्नातकों ने अपने-अपने क्षेत्र में नए-नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। स्वामी श्रद्धानन्द अपने दोनों पुत्रों हरिश्चन्द्र और इन्द्रचन्द्र को लेकर गंगा के किनारे बीहड़ जंगल में चले गए थे। वहीं पर उन्होंने गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति के अपने सपने को साकार किया। उन्होंने भारतीय इतिहास एवं दर्शन की उन्हें शिक्षा दी। आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की उन्हें शिक्षा दी। सदाचार की उन्हें शिक्षा दी। उन्हें अपने देश पर बलिदान होने की शिक्षा दी। उन्हें वीरता एवं निर्भीकता प्रदान की। गुरुकुल का विद्यार्थी "भय' करना नहीं जानता। वह तो साक्षात्‌ "वीरता' है। स्वामी श्रद्धानन्द तो कर्मशूर भी थे। उन्होंने जो कहा वह करके दिखाया। वे केवल भाषण तक सीमित नहीं थे। आज के भाषणकर्त्ताओें का प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि उनकी कथनी और करनी में अन्तर होता है। असली प्रभाव उसी का पड़ता है, जो जैसा कहता है वैसा ही करता भी है। सत्य का उपदेश करने वाले को सत्यवादी होना चाहिए। कर्म का उपदेश करने वाले को कर्मशील होना चाहिए। संयम का उपदेश करने वाले को संयमी होना चाहिए। स्वामी श्रद्धानन्द में ये सभी गुण विद्यमान थे। 

आप अपनी सन्तान को सदाचारी बनाएं। उन्हें देश और जाति पर गर्व करने वाला बनाएं। उन्हें नित्य संध्या और अग्निहोत्र करने वाला बनाएं। तभी देश और जाति की रक्षा हो सकती है। आज के विषाक्त वातावरण में सदाचारी लोगों की आवश्यकता है। 

स्वामी श्रद्धानन्द का चौथा परामर्श वास्तव में एक चेतावनी है। धर्मान्तरण उस समय भी हो रहा था, आज भी हो रहा है। देश के गरीब लोगों को ईसाई बनाया जा रहा था, आज भी बनाया जा रहा है। उन्हें आज मुसलमान भी बनाया जा रहा है। स्वामी श्रद्धानन्द के हृदय में एक टीस थी। इसीलिए उन्होंने दलितोद्धार सभा बनायी। वे नहीं चाहते थे कि धर्मान्तरण हो। दलितोद्धार का मूल मन्त्र है कि सभी को समानता का अधिकार दिया जाए। सभी जगह समता सम्मेलन आयोजित किए जाएं। जब सभी को समान सम्मान मिलेगा, ऊँच-नीच का भेद समाप्त हो जाएगा, सभी को समान अवसर मिलेंगे, तो स्वतः ही धर्मान्तरण का चलन समाप्त हो जायेगा। इस कार्यक्रम को वास्तविक व्यवहार में लाने की आज भी उतनी ही आवश्यकता है, जितनी कि स्वामी श्रद्धानन्द के समय थी। स्वामी श्रद्धानन्द का बलिदान दिवस मनाने की सार्थकता इसी बात में है कि भारतवासी उनके सच्चे अनुयायी बनें। अपनी सन्तान को श्रेष्ठ एवं वैदिकधर्मी बनायें तथा सभी को गले लगाएं। अपनी भाषा का प्रयोग करें। मद्यादि व्यसनों से दूर रहें तथा गोरक्षा हेतु प्राण न्योछावर करने के लिए तैयार हों। -डॉ. धर्मपाल

Contact for more info.- Arya Samaj Mandir, Divya Yug Campus, 90 Bank Colony, Annapurna Road,Indore (MP) Tel.: 0731-2489383

 

जीवन जीने की सही कला जानने एवं वैचारिक क्रान्ति और आध्यात्मिक उत्थान के लिए-
वेद मर्मज्ञ आचार्य डॉ. संजय देव के ओजस्वी प्रवचन सुनकर लाभान्वित हों।
वेद कथा - मनुष्य शरीर देव मन्दिर है।

Ved Katha Pravachan _77 (Explanation of Vedas) वेद कथा - प्रवचन एवं व्याख्यान Ved Gyan Katha Divya Pravachan & Vedas explained (Introduction to the Vedas, Explanation of Vedas & Vaidik Mantras in Hindi) by Acharya Dr. Sanjay Dev

 

Multidimensional Personality Swami Shraddhananda | Arya Samaj Mandir Indore Helpline (9302101186) for Raigad - Nagaur - Pali - Katni - Khandwa - Pune | Official Web Portal of Arya Samaj Bank Colony Indore Madhya Pradesh | बहुआयामी व्यक्तित्व स्वामी श्रद्धानन्द | Arya Samaj Bank Colony Indore Madhya Pradesh India | Arya Samaj Indore MP | Arya Samaj Marriage Indore |  Arya Samaj Mandir Indore address | Arya Samaj and Vedas | Arya Samaj in India | Arya Samaj and Hindi | Marriage in Indore | Hindu Matrimony in Indore | Maharshi Dayanand Saraswati | Ved Puran Gyan  | Ved Gyan DVD | Vedic Magazine in Hindi |  आर्य समाज मंदिर इंदौर मध्य प्रदेश  | स्वामी श्रद्धानन्द